भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल :-
Ø इस काल में महान अध्यात्मिक संतो और भक्तो जैसे कबीर, जायसी, सुर, तुलसी, मीरा आदि ने काव्य रचना की l
Ø इन कवियों ने आध्यात्मिक जागरण का ठोस प्रयास अपने काव्य के माध्यम से किया l यह काव्य निराश जन मानस के लिए संजीवनी बूटी सिद्ध हुई l
Ø इस काल में भाव पक्छ और कला पक्छ का सुंदर समन्वय हुआ l
Ø इस काल में रामचरित मानस, सूरसागर, पदमावतजैसे उत्कृष्ट काव्यो की रचना हुई जो हिंदी कविता के उच्च स्तर को प्रमाणित करते है l इन कारणों से भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल कहा जाता है l
रीतिकाल या उत्तर्मध्यकाल (1700-1900)
रीतिकाल का सामान्य अर्थ परम्परा, अर्थात बंधी हुई परम्परा में काव्य रचना l रीती का सामान्य अर्थ शैली भी है l विशिष्ट पद रचना को रीती कहते है l इस काल के रचना संघर्ष से विमुख होकर अपने राजमहलो में विलासिता में डूबे रहते थे l दरबारी कवि अपने आश्रय दातो की रूचि के अनुसार उनकी विलासिता को उभरने के लिए श्रंगारिक रचनाएँ करने लगे और नायिकाओ के विविध भेद-प्रभेद लक्षणों का चित्रण ही उनका मूल उद्देश्य बन गया l इसलिए इस काल को रीतिकाल की संज्ञा से अभिहित किया गया l श्रंगार रस की प्रधानता के कारण इसे श्रंगार काल भी कहा गया है l कला पछ की प्रधानता के कारण इसे कलाकाल भी कहा जाता है l
रीतिकाल के प्रमुख कवि एवम् उनके रचनाए :- कवि रचनाएँ
1. आचार्य केशव - रामचंद्रिका
2. सेनापति - कवित्त रत्नाकर
3. पदमाकर - जगद विनोद, पदमाभरण
4. बिहारी - बिहारी सतसई
5. घनानन्द - कवित्त संग्रह
नीतिकाव्य के रचयिता कवि :-
वृंद, दिरिधर, बाबु दीनदयाल, गिरी


0 Comments