प्रोग्रामिंग भाषाओ के प्रकार ( Types of Programming Language )
प्रोग्रामिंग भाषा कई है । कुछ को हम समझते हैं तथा कुछ को केवल कम्प्यूटर ही समझता है जिन भाषाओ को केवल कम्प्यूटर समझता है वे आमतौर पर निम्नस्तरीय भाषा ( Low level Language ) कहलाती है तथा जिन भाषाओ को हम समझ सकते है उन्हें उच्चस्तरीय भाषा ( High level language ) कहते है ।
निम्न स्तरीय भाषा ( Low Level Language ) : वह भाषाएँ ( Languages ) जो अपने संकेतो को मशीन संकेतो में बदलने के लिए किसी भी अनुवादक ( Translator ) को सम्मिलित नहीं करता , उसे निम्न स्तरीय भाषा कहते है अर्थात निम्न स्तरीय भाषा के कोड को किसी तरह से अनुवाद ( Translate ) करने की आवश्यकता नहीं होती है । मशीन भाषा ( Machine Language ) तथा असेम्बली भाषा ( Assembly Language ) इस भाषा के दो उदाहरण है । लेकिन इनका उपयोग प्रोग्राम ( Program ) में करना बहुत ही कठिन है । इसका उपयोग करने के लिए कम्प्यू टर के हार्डवेयर ( afardware ) के विषय में गहरी जानकारी होना आवश्यक है । यह बहत ही समय लेता है और त्रुटियों ( Error ) की सम्भावना अत्यधिक होती है । इनका संपादन language ) से तेज होता है । ये दो प्रकार की होती है –
1. मशीन भाषा ( Machine Language )
2. असेम्बली भाषा ( Assembly Language )
मशीन भाषा ( Machine Language ) : है जोकि बाइनरी ( Binary ) - 1 या कम्प्यू टर प्रणाली ( Computer System ) सिर्फ अंको के संकेतो को समझाता है . जा 0 होता है । अत : कम्प्यूटर को निर्देश सिर्फ बाइनरी कोड । या में ही दिया जाता है और जो निर्देश बाइनरी कोड ( Binary Code ) में देते हैं उन्हें मशीन भाषा ( Machit Code ) में देते हैं उन्हें मशीन भाषा ( Machine Language ) कहते है । मशीनी भाषा ( Machine Level Language ) मशीन के लिए सरल हा Level Language ) मशीन के लिए सरल होती है और प्रोग्रामर के लिए कठिन होती है । मशीन भाषा प्रोग्राम का रख रखाव भी बहुत कठिन होता ह । क ख रखाव भी बहुत कठिन होता है । क्योकि इसमें त्रुटीयो ( Error ) की संभावनाएँ अधिक Machine Language प्रत्येक Computer System पर अलग - अलग काय , anguage प्रत्येक Computer Svetem पर अलग - अलग कार्य करती है , इसलिए एक कंप्यूटर के कोड दूसरे कंप्यूटर पर नहीं चल सकते । .
असेम्बली भाषा ( Assembly Language ) : असेम्बली भाषा में निर्देश अंग्रेजी के शब्दों के रूप में दिए जाते है . जैसे की NOV , ADD . SUB आदि . इसे " mnemonic code " ( निमोनिक कोड ) कहते है मशीन भाषा की तुलना में असेम्बली भाषा को समझना सरल होता है लेकीन जैसा की हम जानते है की कम्प्यूटर एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस ( Electronic Device ) है । और यह सिर्फ बाइनरी कोड ( Binary Code ) को समझता है , इसलिए जो प्रोग्राम असेम्बली भाषा में लिखा होता है , उसे मशीन स्तरीय भाषा ( Machine level language ) में अनुवाद ( Translate ) करना होता है । ऐसा Translator जो असेम्बली भाषा ( Assembly language ) को मशीन भाषा ( Machine language ) में Translate करता है , उसे असेम्बलर ( Assembler ) कहते है ।
डाटा ( Data ) को कम्प्यूटर रजिस्टर में जमा किया जाता है और प्रत्येक कम्प्यटर का अपना अलग रजिस्टर सेट होता है , इसलिए असेम्बली भाषा में लिखे प्रोग्राम सुविधाजनक नही होता है । इसका मतलब यह है कि दसरे कम्प्यूटर प्रणाली के लिए हमें इसे फिर से अनुवाद करना पड़ता है ।
उच्च स्तरीय भाषा ( High Level Language ) : उच्च स्तरीय भाषा ( High level language ) सुविधाजनक होने के लक्षणों को ध्यान में इस जी गट कि ये भाषा मशीन पर निर्भर करती है । यह भाषा अंग्रेजी भाषा के कोड जैसी होती है । इसलिए इसे कोड करना या समझना सरल होता है । इसके लिए एक 1 . 4 भाषा के Program को मशीन कोड में translate करता है इसके उदाहरण है - फॉरटरेन FOAMदेसिक ( BASIC ) , कोबोल ( COBOL ) , पास्कल ( PASCAL ) , सी ( C ) , सी + + ( C + + ) , जावा VISHAL BASIC , Visual Basic . net HTML , Sun Studio आदि इसी श्रेणी ( Category ) की भाषा हा इसको दो generation में बॉटा गया गई ।
1. Third Generation Language
2. Fourth Generation Language
लैंग्वेज की पीढ़ियाँ
(1.) प्रथम पीढ़ी की लेंग्वेज ( 1940 - 50 ) [ मशीन लेंग्वेज ]
1) इस पीढ़ी की लेंग्वेज को मशीन या लो लेंग्वेज कहते हैं ।
2) यह लेंग्वेज मशीन विशेष पर निर्भर करती थी ।
3) यह ऐसी पहली प्रोग्रामिंग लेंग्वेज थी , जिसमें बायनरी कोड के 0 व 1का उपयोग किया गया ।
4) इन लेंग्वेज में बहुत ही तकनीकी व विशेषज्ञ व्यक्ति ही कार्य कर सकते थे ।
5) साधारण यूजर ( उपयोगकर्ता ) का इन लेंग्वेज में कार्य करना बहुत मुश्किल था ।
6) इन्हें सीखना बहुत कठिन था ।
7) इन्हें लिखना , पढ़ना व इनकी त्रुटियाँ ढूँढना बहुत कठिन कार्य होता था ।
8) प्रोग्रामर के समय के रूप में ये बहुत ही मँहगी लेंग्वेज थी ।
(2.) द्वितीय पीढ़ी की लेंग्वेज ( 1950 - 1960 ) [ एसेम्बली लेंग्वेज ]
1) यह लेंग्वेज 0 . 1 व कुछ विशेष चिह्न जिन्हें निमोनिक कहते हैं ( जैसे - ADD , S UB . LOAD , SUM इत्यादि ) का उपयोग करती हैं । इसलिये इन्हें सिम्बॉलिक लेंग्वेज कहते हैं ।
2) ये लेंग्वेज विशेष मशीन व विशेष माइक्रोप्रोसेसर ( सी . पी . यू . ) को आधार मानकर बनायी जाती है । जैसे
(i) INTEL ( IBM ) माइक्रोप्रोसेसर के लिये विशेष ऐसेम्बली लेंग्वेज ।
(ii) MOTOROLA ( APPLE ) माइक्रोप्रोसेसर के लिये विशेष ऐसेम्बली लेंग्वेज ।
3) इस लेंग्वेज ट्रांसलेटर ( बदलने वाला ) जो कि ऐसेम्बलर कहलाता है , यह ऐसेम्बली लेंग्वेज प्रोग्राम को मशीन लेंग्वेज में बदलने के लिये जरूरी होता है ।
4) इस लेंग्वेज में प्रोग्रामर को प्रोग्रामिंग के लिए , किसी विशेष कम्प्यूटर के लिये बहुत आसानी से कंट्रोल होता है किन्तु यहाँ पर कोई विशेषज्ञ व्यक्ति ही प्रोग्रामिंग कर सकता है ।
5) न्यूमेरिक ( नम्बर ) कोड की जगह पर ऐल्फाबेट्स के उपयोग से उन्हें याद रखना आसान हो गया । फिर भी साधारण यूजर के लिये यह बहुत कठिन होता है ।
6) इसे सीखना बहुत कठिन था ।
7) इसे लिखना , पढ़ना व इसमें त्रुटियाँ ढूँढ़ना कठिन था ।
8) इसकी कीमत ( प्रोग्रामर के समय के रूप में ) बहुत ज्यादा थी ।
9) यह सिस्टम सॉफ्टवेयर में भी उपयोग की जाती है ।
10) इसे आज भी कम्प्यूटर की प्रोग्रामिंग विधि के रूप में मशीन आधारित लेंग्वेज में उपयोग किया जाता है ।
(3.) तृतीय पीबीकीलेंज 1960 - 1970 [ हाई लेवल लैंग्वेज ]
1) यह इंग्लिश के समान लेंग्वेज है व इसमें बायनरी सिस्टम का उपयोग नहीं होता है ।
2) यह पोर्टेबल ( अर्थात मशीन पर निर्भर नहीं रहने वाली ) लेग्वेज है ।
3) यहाँ पर लेंग्वेज टांसलेटर के रूप में इन्टरप्रिंटर या कम्पाइल का उपयोग किया जाता है ।
4) यह सामान्यत : पेशेवर पोयामर के द्वारा उपयोग की जाती है ।
5) अभी भी इसे साधारण यूजर को उपयोग करने में कुछ समस्या थी । इसे सीखना कठिन होता है । ( 7 ) इसे पढ़ना , लिखना व इसमें त्रुटियाँ ढूँढना कठिन होता है । ( 8 ) इन लेंग्वेजों को बैच प्रक्रिया के द्वारा बनाया जाता है ।
6) ये सभी सामान्यत : प्रोसीजर लेंग्वेज होती हैं ।
7) ये सभी फाईल ओरियंटेट लेंग्वेज होती है ।
8) द्वितीय पीढ़ी की तुलना में इनके नियम , रूप व सिन्टेक्स ( व्याकरण ) अधिक आसान होते हैं ।
9) उदाहरण BASIC , ALGOL , COBOL FORTRAN , PASCAL , PCL , BCPL , B , C इत्यादि ।
(4.) चौथी पीढ़ी की लेंग्वेज ( 1970 - 1980 ) [ परिष्कृत हाई लेवल लेंग्वेज ]
1) तीसरी पीढ़ी को लेंग्वेज की तुलना में इनमें बहुत अधिक सुधार था ।
2) ये भी मशीन से स्वतंत्र लेंग्वेज है ।
3) इनमें लेंग्वेज ट्रांसलेटर जैसे इन्टरप्रिंटर या कम्पाईलर का उपयोग किया जाता है ।
4) यह भी सामान्यतः पेशेवर प्रोग्रामर के द्वारा उपयोग की जाती है ।
5) साधारण यूजर इसको आसानी से उपयोग कर सकते हैं ।
6) इसे सीखना आसान होता है ।
7) इसे लिखना , पढ़ना व इसमें त्रुटियाँ ढूँढना अधिक आसान होता है ।
8) इन लेंग्वेजों का उपयोग ऑनलाईन डेवलपमेंट ( प्रोग्राम बनाना ) में किया जाता है ।
9) ये सामान्यत : नान प्रोसीजर लेंग्वेज होती है ।
10) ये सामान्यत : डेटाबेस पर आधारित होती है ।
11) इन लेंग्वेजों में कुछ विशेष गुण शामिल किये हैं ; जैसे - क्यूरी लेंग्वेज , रिपोर्ट जनरेटर्स , OPP लेंग्वेज , पैरेलल प्रोसेसिंग लेंग्वेज , एप्लीकेशन जनरेटर ।
12) उदाहरण - C + + , KLI , RPG , स्मॉल टॉक , SOL इत्यादि ।
(5.) पाँचवी पीढ़ी की लेंग्वेज ( 1980 - 1990 ) [ आर्टिफीशियल इन्टेलिजेन्स IAL लेंग्वेज ]
1) इन लेंग्वेज में लेग्वज के बहुत हा असाधारण गुण जैसे - आर्टिफिशियल इटेलीजेन्सी ( कृi बुद्धिमता ) का उपयोग किया जाता है । ]
2) ये लेंग्वेज डेटाबेस सिस्टम की तुलना में नॉलेज बेस्ड सिस
3) इन लैंग्वेज के मुख्य गुण इस प्रकार है - परलल प्रसिसिंगलैंग्वेज , क्यरी लेंग्वेजेस App लेंग्वेजेस इत्या सिस्टम पर आधारित होती हैं ।
Program Development Steps :
किसी प्रोग्राम को लिखने में नीचे दिये गये छ : गतिविधियों को शामिल किया जाता है ।
1 प्रोग्राम की बारिकियों को समझना ( Understanding Program specification )
एक प्रोग्राम प्रतिरुप को डिजायन करना ( Designing a Program Model )
3 प्रोग्राम की शुद्धता निर्धारित करना ( Determining Correctness of the Program )
प्रोग्राम का कोड तैयार करना ( coding the Program )
5 प्रोग्राम की जांच करना तथा उसे डिबग करना ( Testing and Debugging the Program )
6 प्रोग्राम का दस्तावेज तैयार करना ( Preparing Documentation of the Program )
प्रोग्राम की बारिकियों को समझना ( Understanding Program Specification )
प्रोग्राम की बारिकियों को समझने में दो मुख्य गतिविधियों होती है । पहली गतिविधि यह है कि समस्या को परिभाषित किया जाये । फिर आवश्यकताओं का विश्लेषण किया जाये ।
समस्या को परिभाषित करना ( Defining the Problem )
प्रोग्राम मॉडल को डिजायन करने से पहले जो प्रथम पूर्वापक्षा आपको पूरी करनी है वह प्रोग्राम जिस समस्या का समाधान करेगा उसका एक स्टेटमेंट तैयार करना है बिना किसी संभावित समाधान पर चर्चा किये परिभाषा यह निर्धारित करती है कि आखिर समास्या क्या है यह एक से दो पृष्ठ का एक सरल कथन ( Statement ) इसे समास्या की भॉति ही प्रतीत होना चाहिए । समास्या निर्धारण , आवश्यकता विश्लेषण के पहले आता है । जो कि समास्या का अधिक व्यापक विश्लेषण है ।
आवश्यकता विश्लेषण ( Requirment Analysis )
आवश्यकताएं इस बात का वर्णन करती है कि प्रोग्राम से अपेक्षायें क्या हैं । ये समाधान की दिशा में प्रथम चरण हैं । इस आवश्यकता निर्धारण गतिविधि को " फंक्शनल विनिर्धारण ' के नाम से भी जाना जाता है । आवश्यकताओं के विश्लेषण में नीचे के तीन प्रश्नों का उत्तर विश्लेषण को अधिक फलदायी बना सकता
1 . इनपुट के रुप में क्या दिया जाता है ?
2 . आउटपुट के रुप में क्या अपेक्षित है ?
3 . समाधान पर कैसे पहुंचा जाए ?
प्रोग्राम मॉडल डिजाइन करना ( Designing a Program Model )
समस्या के एक बार निर्धारित हो जाने पर इसका अल्गोरिदम ( प्रॉसेसिंग लॉजिक के लिये एक अन्य शब्द ) विकसित किया जा सकता है । यह प्रोग्रामिंग का सबसे रचनात्मक भाग है । इस चरण में अल्गोरिदम । को संभव विकल्पों के चितन के निये व्यापक दृष्टि में निर्मित किया जाता है । अल्गोरिदम एक ऐसा फॉर्मूला विधि या चरण दर चरण प्रक्रिया है जिसका अनुसरण समस्या के समाधान की । प्राप्ति के लिये किया जाता है । प्रोग्राम लेखन के आधार के रूप में उपयोगी होने के लिये एक अल्गोरिदम को निश्चय ही –
1 . निश्चित समय में सही समाधान पर पहुंचना चाहिए ।
2 स्पष्ट , सटीक और भ्रम से मुक्त होना चाहिए और
3 . एक ऐसे फॉर्मेट में होना चाहिए जिसे प्रोग्रामिंग भाषा में सुन्दर क्रियान्वयन की ओर अग्रसर होता है ।
प्रोग्राम की शुद्धता निर्धारित करना ( Determining Correctness of the Program )
प्रोग्राम या अल्गोरिदम के विकास में कभी - कभी सर्वाधिक थकाऊ और सबसे कठिन चरण यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रोग्राम या अल्गोरिद्म त्रुटिहीन है । किसी प्रोग्राम या अल्गोरिदम की शुद्धता का अर्थ है यह सही आउटपुट प्रदान करे तथा वही करे जिसकी उससे अपेक्षा की गयी है । किसी प्रोग्राम या अल्गोरिदम की शुद्धता को ड्राई रन ( Dry run ) . स्वतंत्र परीक्षण ( independent inspection ) . स्ट्रक्चर्ड वॉकधू ( Structured walkthrough ) में से किसी विधि का प्रयोग कर जॉचा जा सकता है ।
प्रोग्राम की कोडिंग करना ( Coding the ProGRAM )
यह हमारे समाधानो ( Solutions ) जैसे अल्गोरिद्म बदलने की प्रक्रिया है । यहाँ हम एक प्रोग्रामि करते हुए . अपने अल्गोरिदम को जो अब तक पलाचा परिवर्तित करते है । tutions ) जैसे अल्गोरिदम ( फ्लोचार्ट / छमकोड ) को वास्तविक कम्य यहा हम एक प्रोग्रामिंग भाषा का चयन करते है तथा भाषा का सिन्टैक्स टमकोड में अभिव्यक्ति है को प्रोग्रामिंग लिये प्रयोक्ता प्रोग्राम की जाँच करना तथा वृटि को हटा कोडिग एक बार पूरा हो जाने के बाद , आपण प्राग्राम को मशीन कोड में कम्पाइल करेगा । कम्पाइल कम प्रोग्राम को जो उच्चस्तरीय भाषा का प्रयोग कर द्वारा समझने लायक भाषा है ।
प्रोग्राम की जाँच करना तथा त्रुटि को हटाना ( Testing and debugging the Program )
को कम्प्यटर में प्रविष्ट करेंगे । फिर कम्प्यटर पारल करने का अर्थ सोर्स कोड , उदाहरण के लिये उच्चस्तरीय भाषा का प्रयोग करके लिखी गयी है , को मशीन कोड में बदलना . जो म बदलना . जो मशीन के
सिन्टैक्स त्रुटियाँ ( Syntax Errors )
सिन्टैक्स चुलियों तब पैदा होती है जब कम्प्युटर भाषा काम्या स्टार भाषा कम्पाइलर प्रोग्रामर द्वारा प्रविष्ट किये गये कमाल समझ पाता । ऐसी टि से सामना होने पर कम्प्यूटर प्रोग्राम को अस्वीकार कर देता है और त्रुटि सं ताहायटियाँ कम्पाइलेशन के दौरान सामने आती है आर इन्ह सूधारना आसान - " मला म यत्रुटियों वर्तनी की गलतियों कॉमा इत्यादि का छूट जाना आर गलत सिन्हा कारण उत्पन्न होती है । उदाहरण के लिये सी में यदि Printf की जगह PRINT टाइप करते है तो इससे सिन्टैक्स त्रुटि उत्पन्न होती है ।
कार्यान्वयन त्रुटियाँ ( Execution Errors )
इन त्रुटियों से सामना त्रुटिहीन कम्पाइलेशन के पश्चात् प्रोग्राम के कार्यान्वयन के समय होता है । कार्यान्वयन त्रुटि को रन टाइम ( Runtime ) त्रुटि भी कहा जाता है । इस प्रकार की गलतियों के संभावित कारण निम्नलिखित है ।
1 . असीमित लूप का प्रयोग ।
2 केवल कुछ खास डेटा के लिये ही सही आउटपुट ।
3 . गलत डेटा या डेटा गलत क्रम में ।
4 . गलत फाइल का नाम ।
5 . डिवाइड - चेक त्रुटियों - ये तभी प्रकट होते हैं जब किसी सख्या को शून्य के द्वारा भाग किया जाता है या फिर उस संख्या के द्वारा जो शून्य के बहुत करीब हो ।
तार्किक त्रुटियाँ ( Logical Errors )
तार्किक त्रुटियों का कारण प्रोग्राम की कोडिंग करते समय प्रोग्रामरों द्वारा की गई गलतियाँ होती है । कम्प्यूटर में तार्किक त्रुटियों को पकड़ने की क्षमता नहीं होती । इससे निश्चय ही गलत परिणाम प्राप्त होगा । ऐसी । त्रुटियों को सिर्फ ड्राइ रन के माध्यम से पकड़ा जा सकता है । इन त्रुटियों को सधारने के लिये हमें प्रोग्राम । के अल्गोरिदम से हो कर गुजरना होगा । इन त्रुटियों को कुछ सेम्पल प्रोग्रामों को रन कर के जिसके उत्तर हमें ज्ञात हो , आसानी स पकड़ा जा सकता हा प्राग्राम को ठीक से डिजाइन कर ऐसी अधिकांश त्रुटियों का । टर किया जा सकता है । पूरे प्रोग्राम की जाँच और सावधानीपूर्वक किया गया डाइरन और वॉक थूकुछ एस तरीके हैं जिनकी सहायता से इन त्रुटियों को दूर किया जा सकता है ।
डिबग करना ( Debugging )
डिबग किसी त्रुटि के मूल कारण का पहचान कर उसे दूर करने की पटिया है जो प्रारभिक रुप से किसी त्रुटि का पता लगाने की प्रक्रिया है । करन का प्रक्रिया है । यह जाँच के ठीक विपरीत बार लिख लिये जाने और डिबग कर लिये जाने के बाद यह कार्य हेत तैयार होता बहतु तैयार होता हैं और
दस्तावेजीकरण ( Documentation )
प्रोग्राम के एक बार लिख लिये जाने और डिया इसरलिये इसे अब दस्तावेज या लिखित प्रासीजर की आव डेटा प्रविष्ट किस प्रकार किया जाय किस - जाय , आदि के उत्तर होते हैं । किसी प्रोग्राम के दस्ता तथा अल्गोरिद्म और प्रक्रियाओं का विस्तात Viren hv Pawan DewanganaSSIONSamaAR " हाला है जिसमें प्रोग्राम कैसे चलाया जाय . किस प्रकार किया जाय किस तरह का समस्याएं अपेक्षित हूँ और किस प्रकार हण्डल , सलर होते है । किसा प्राग्राम के दस्तावेजीकरण में फ्लोचाट / छदमकोड प्राग्राम और प्रक्रियाओं का विस्तृत लाखत विवरण शामिल होता है । किसी प्रोग्राम का ARELAshoka Sallege . kawardha गर हैण्डल किया काड . प्रोग्राम की सूची प्राग्राम के रख – रखावके लिये दस्तावेजीकरण आवश्यक है । बिना सही दस्जावेजीकरण के बाद में प्रोग्राम में बदलाव कर पाना अत्यन्त कठिन होगा ।
Programming Paradigms प्रोग्रामिंग प्रतिमानः
प्रोग्रामिंग प्रतिमान प्रोग्राम लिखने की मूलभूत शैली है । कोई एक प्रोग्रामिंग भाषा कई प्रोग्रामिंग प्रतिमान को सपोर्ट कर सकती है । कुछ भाषा कोई एक प्रतिमान को सपोर्ट करती है । यह किसी एक प्रोग्रामिंग भाषा में समस्याओं के समाधान को किस प्रकार प्रतिपादित किया जाये से सबंधित होता है । प्रोग्रामिंग भाषाए निम्न प्रोग्रामिंग प्रतिमान को सपोर्ट करती है :
Object Oriented Programming :
यह एक ऐसा प्रोग्रामिंग प्रतिमान है जो अनुप्रयोगों तथा कम्प्युटर प्रोग्रामो को डिजाइन करने में आब्जेक्टों का उपयोग करती है । इसमें प्रत्येक प्रत्येक ऑब्जेक्ट अन्य ऑब्जेक्ट्स में संदेश प्राप्त करने , डाटा प्रोसेस करने तथा संदेश भेजने में सक्षम होता है । प्रत्येक ऑब्जेक्ट को एक पृथक भूमिका या उत्तरदायित्वों के साथ एक स्वतंत्र छोटी मशीन के रूप में देखा जा सकता है । इसमें माड्यूलरिटी पर अपने जोरदार बल के कारण Object Oriented Programming का विकास करना अधिक सरल और बाद में उसे समझ पाना अधिक आसान हो जाता है या प्रत्यक्ष विश्लेषण कोडिंग तथा जटिल स्थितियों एवं प्रोसीजरों की अपेक्षाकृत ज्यादा सहायक है ।
C + + JAVA . VB . NET आदि Object Oriented Programming के उदाहरण है
Structured Programming :
इस प्रकार के प्रोग्रामिंग में पढ़ने एवं समझने में सरल छोटे - छोटे माड्यूल मिलाकर बड़े प्रोग्राम के निर्माण को स्ट्रक्चर प्रोग्रामिंग कहते हैं । प्रत्येक माड्यूल में एक ही प्रवेश एवं निकास ( Enterance and Exit ) होता था , तथा एक ही कार्य को पूरा करता था । इसे किसी भी प्रोग्रामिंग भाषा के साथ प्रयुक्त कर सकते हैं । पहले की कोडिंग तकनीक पढ़ने , समझने एवं मेन्टेन करने में बहुत मुश्किल होती थी । सॉफ्टवेयर निर्माण की प्रकिया में मदद करने में सक्षम नहीं थी । साफटवेयर डेवलपमेंट की इन समस्याओं के सबसे उपयुक्त समाधान के रूप में कोड के पूनः । उपयोग की तकनीक को मान्यता दी गयी है । कोड के पुनः उपयोग द्वारा प्रोग्रामों का निर्माण तीव्रता से एव शुद्धता से संभव हो सकता है । C . ALGOL , Pascal . BASIC आदि Structured Programming के उदाहरण है ।
Functional Programming :
यह भी एक प्राग्रामिंग प्रतिमान है जो गणना को गणितीय फलनो ( Function ) के मूल्याकन के रूप में व्यवहार करता है तथा स्थिर एवं परिवर्तनीय डाटा की उपेक्षा करता है । इसमे स्थिति में परिवर्तन पर बल देने वाले आदेश सचक प्रोग्रामिंग शैली के विपरीत यह Function के अनुप्रयोग पर बल देती है । function पुनः उपयोग किये जा सकने वाले code का एक समुह होता है । किसी Program में ऐसे code जिसका उपयोग हमे बार - बार करना पड़ता है उन सभी को हम कई छोटे - छोटे function बनाकर उसके अंदर रख देते है । जिसके कारण एक ही code को हमे बार - बार नहीं लिखना परता है और Program का source code छोटा और साफ दिखाई देता ।
ठस प्रोग्रामिंग में विशेष रूप से शुद्ध रूप से फंक्शन अधारित भाषाओं पर व्यावसायिक सॉफटवेयर विकास की अपेक्षा शिक्षण संस्थानों में अत्यधिक बल दिया जाता है । PHP Python आदि Structural Programming के उदाहरण है ।
Process Oriented Programming :
Pascal , C , Basic , Fortran जैसी पारम्परिक भाषाएं Process Oriented Languages के उदाहरण हैं , जिसमें प्रत्येक Statement Computer को कुछ करने का आदेश देता है । यानी Procedural Language Program , Instructions का एक समूह होता है । Procedural Languages में छोटे Programs के लिये किसी भी अन्य प्रकार के Pattern की आवश्यकता नही होती है । Programmer Instructions की List बनाता है और Computer उनके अनुसार काम करता है ।
जब प्रोग्राम काफी बडे व जटिल हो जाते हैं , तब Instructions की यह Instruction List काफी परेशानी पैदा करती है । इसलिये एक बड़े प्रोग्राम को छोटे - छोटे टुकड़ों में बांट दिया जाता है । इन छोटे - छोटे टुकड़ों को Functions कहा जाता है । Functions को दूसरी अन्य भाषाओं में Subroutine , Sub - Program या Procedure कहा जाता है । एक बड़े प्रोग्राम को छोटे - छोटे Functions में विभाजित करने से पूरा Program Functions का एक समह बन जाता है । इसे Module कहा जाता है । लेकिन ये Modules भी Procedural Programming में ही आते हैं क्योंकि सभी Functions में Statements की एक List होती है और सभी Functions मिल कर पूरा Program बनाते हैं , जिससे परा Program Instructions की एक बहुत बड़ी List बन जाता है ।


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