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Whate is छंद (Scansion) ll Chhand kya hai types of chand छंद (Scansion)

छंद (Scansion)


परिभाषा :- छंद का अर्थ होता है, बांधना l छंद उस पद्द रचना को कहते है, जो एक विशेष वर्ण, योजना,मात्र तथा लय में बंधी होती है l
उदाहरण – गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पाय l
                 बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय l l

दोहा छंद में चार चरण होते है l पहले और तीसरे में 13-13 मात्राएँ व दुसरे तथा चौथे में 11-11 मात्राएँ होती है  l  

छंद के प्रकार ;-
1) वार्णिक छंद 
2) वर्णिक वृंत 
3) मात्रिक छंद 
4) मुक्तक छंद

1. वार्णिक छंद :- जिन छंदों की रचना वर्णों की गणना के आधार पर होती है, उसे वर्णिक चाँद कहते है l दुर्मिला सवैया

उदाहरण – मै जो न्य ग्रन्थ विलोक्ता हूँ l
                 माता मुझे वह नव चित्र सा ll

इसमें ‘यमाताराजभानसलगा’ के तीन –तीन वर्णों से वाण बनते हैl दीर्घ मात्राएँ गुरु ओर हृस्व मात्राएँ लघु गिनी जाती है जैसे यगण में यमाता अर्थात (ISS) इस प्रकार वर्णों की गिनती की जाती हैl इसमें प्रत्येक चरण में दो तगण (SSI) एक जगण (ISI) और अंत में दो गुरु (SS) यह इन्द्र्चज्र वर्णिक छंद है l

2. वर्णिक वृंत :- इसमे वर्णों की वर्णन होते है और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु-गुरु का क्रम निश्चित होता है l
मत्तगयन्द सवैया l 

उदाहरण :- या लकुटी अऊ कमरिया पर ,
राज तिहुँ पुट को तजि डारौ l इसमे 7 भगण (SII) तथा दो गुरु इस प्रकार 23 वर्ण है l यह सवैया का उदाहरण है l     

3. मात्रिक छंद :- जिन छन्दों की रचना मात्राओ की वणनाके आधार पर होती है, उन्हें मात्रिक छंद कहते है l दोहा, चौपाई. रोला 
उदाहरण – मंगल भवन अमंगल हारी l
                 द्रवहु सो दशरथ अजिर बिहारी l l 

4. मुक्तक छंद :- चरणों की अनियमित, असमान स्वछंद और भाव के अनुकूल गति विधान ही मुक्तक छंद की विशेषता है l इसे खर या केचुआ छंद भी कहते है l 

उदाहरण – मै रथ का टुटा पहिया हूँ l
                 लेकिन मुझे फेको मत,
                 क्या जाने कहाँ इस दुरूह चक्रव्यूह में अक्षौहिणी सेनाओ को चुनौती देता हुआ l
                 कोई दुःसाहसी अभिमन्यु आकर धिर र जाये ll

छंद के अंग :-
1. चरण या पाद
2. वर्ण और मात्रा
3. रति
4. गति  
5. तुक
6. गण

1. चरण या पाद :- चरण को पाद भी कहते है l एक छंद में प्रायः चार चरण होते है चरण छंद का चौथा हिस्सा होता है l
चरण के प्रकार :-
a) समचरण :- दुसरे और चौथे चरण को समचरण कहते है l
b) विषमचरण :-पहले और तीसरे चरण को विषमचरण कहते है l 

2. वर्ण और मात्रा :- वर्ण और मात्र के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते है l मात्रा की दृष्टी से वर्ण दो प्रकार के होते है (I) ह्रस्व (लघु) वर्ण तथा (ll) दीर्घ वर्ण l लघु वर्ण में एक मात्रा होती है l लघु का चिन्ह (l) एवं गुरु का चिन्ह (S) है l

3. रति :- किसी चाँद को पढ़ते समय जहाँ हम रुकते या विराम लेते है, उसे यती कहते है l

उदाहरण – मेरे प्यारे, कुँवर अब भी, क्यों नही मेह आये l – हरिऔध प्रियप्रवास
         
4. गति :- गति का अर्थ छंद की लय प्रवाह से है, जिसका अनुमान पढ़ते समय पाठक को होता है, उसे गति कहते है l

5. तुक :- तुक का अर्थ वर्णों की आवृति है l चरण के अंत में वर्णों की आवृति को तुक कहते है l 

तुक की दृष्टी से दो पारकर की होती है –
a. तुकान्त :- तुकान्त कविता इसके चरण के अंत में वर्णों की आवृति होती है l
उदाहरण – हमको बहुत है आती हिंदी l 
                 हमको बहुत है प्यारी हिंदी ll 

b. अतुकान्त :- अतुकान्त कविता जिसके चरण के अंत में वर्णों की आवृति नहीं होती l
उदाहरण – कविताओ में 

6. गण :- वार्णिक छंदों की गणना गण के अनुसार की जाती है तीन वर्णों का एक गन होता है l गणों की संख्या आठ होती है यथा यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण (यमाताराजभानसलगा) l

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