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रस (JUICE)



रस की परिभाषा :- रस का अर्थ होता है आनंद l जिस कविता, कहानी. नाटक, उपन्यास, आदि को पढ़ते समय, सुनते समय एक अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है, उसे रस कहते है l

रस के प्रकार एवं स्थयी भाव :-
रस स्थायी भाव 
1. श्रृगार रस - रति भाव  
2. हास्य रस - हँसी भाव
3. करुण रस - शोक 
4. रौंद्र रस - क्रोध 
5. वीर रस - उतशाह 
6. भयानक रस - भय 
7. वीभत्स रस - जुगुत्सा (घृणा)
8. अदभुत रस - आश्चर्य (विस्मय)
9. शान्त रस - निर्वेद (शम)
10. वात्सल्य रस - वत्सल (संतान प्रेम)


रस के भेद :- 
1. विभाव 
2. अनुभाव 
3. स्थायी भाव 
4. सन्चारी भाव 

1. विभाव :- स्थायी भाव को जागृत करने वाले कारण को विभाव कहते है l 
ये दो प्रकार के होते है ;-
a) आलम्बन – ऐसे कारण जिन पर भाव अवलम्बित रहते है, उन्हें आलम्बन विभाव कहते है ये दो प्रकार केव होते है –

अ) आश्रय – जिस व्यक्ति के चित में रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न होते है, उसे आश्रय कहते है l

ब) विषय जिस व्यक्ति अथवा वस्तु के प्रति आश्रय के मन में रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न होते है, उसे विषम कहते है l इसका दूसरा नाम आलम्बन भी है l

उदाहरण – जैसे दुष्यंत के मन में शकुंतला को देखकर रति भाव अर्थात प्रेम उत्पन्न हो रहा है तो दुष्यंत आश्रय कहलायेगा और शकुंतला विषय कहलाएगी l   

b) उद्दीपन – जो आलम्बन द्वारा उत्पन्न भावों को उद्दीप्त करते है, अर्थात तीव्र करते है l 

2. अनुभाव :- आश्रय की बाह्य चेष्टाओ को अनुभाव कहते है इसी को अंग्रेजी में एक्टिंग भी कहते है l 
यथा- भालु से भयभीत व्यक्ति का कांपना, चीखना, हाथ-पांव मरना, भागने की चेष्टा करना आदि अनुभाव के उदाहरण है l 

3. स्थायी भाव :- जो भाव सहृदय के हृदय में स्थायी रूप से विद्द्यामन रहते है अर्थात चिरकाल तक चित्त में स्थिर रहते है, उन्हें स्थायी भाव कहते है इन्हें छिपाया नहीं जा सकता l इनके स्वरूप में परिवर्तन नही होता l दस रसो की तरह स्थायी भाव भी दस माने जाते है l  

4. सन्चारी भाव :- जो भाव सहृदय के हृदय में स्थित अस्थायी रूप से विद्यमान अर्थात आश्रय के चित में जल्दी-जल्दी उत्पन्न होने वाले अस्थित मनोविकारों को संचारी भाव कहते है l 
यथा – भयभीत के मन में उत्पन्न चिंता, शंका, त्राण, मोह, जड़ता, उन्माद आदि भाव संचारी भाव कहलाते है l 

संचारी भावों की संख्या वैसे तो असंख्य मानी जाती है, किन्तु मुख्यतः उसकी संख्या 33 मानी गई है, जो निम्न है – निर्वेद, ग्लानी, मद, स्मृति, शंका, आलस्य, चिंता, दीनता, मोह, चपलता, हर्ष, धृति, त्रास, उग्रता, उन्माद, असुय, श्रम, क्रीड़ा, आवेग, गर्त, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, स्वप्न, निबोध. अवमर्ष, अवहित्था, गति, व्याधि, मरण, वितर्क,जड़ता l 


रस के प्रकार का संक्षिप्त वर्णन :-

1. श्रृगार रस :- सहृदय के हृदय में स्थित रति नामक स्थायी भाव का जब विभव, अनुभाव और संचारी भाव के साथ संयोग होता है, तब श्रंगार रस की निष्पत्ति होती है l   
उदाहरण – बतरस लालच लाल को, मुरली धरे लुकाय l
          सौहे करे, भौह्नी हँसे, डैन कहै नरी जरl l l 

इसका - स्थयी भाव रति है l
इसके दो भेद है –

अ) संयोग श्रंगार रस – जहाँ पर नायक और नायिका का संयोग या मिलन हो वहां संयोग श्रंगार रस होता है l

उदाहरण -  राम को रूप निहारती जानकी, कंगन के नग की परिछाही l
                  नामें सबै सुधि भूली गई, कर टेकि रही पल टारती नाही l l

ब) वियोग श्रंगार रस - जहाँ पर नायक और नायिका का वियोग हो वहां वियोग श्रंगार रस होता है l इसे विप्रलंभ श्रंगार भी कहते है l

2. हास्य रस :- सहृदय के हृदय में स्थित हास नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वहां हास्य रस होता है l या किसी विभिन्न वेश-भूषा, हाव-भाव या कार्य को देखकर हँसी आती है, वहां हास्य रस होता है l हास्य रस का स्थायी भाव हँसी है l

उदाहरण – कहा बंदर ने बंदरिया से चलो नहाये गंगा l
        बच्चो को छोड़ेंगे घर मे होने दो हुड्दंगा ll   

3. करुण रस :- शोक नामक स्थयी भाव का जब विभाव, अनुभाव,और संचारी भाव से संयोग होता है या जहाँ प्रियतम की मृत्यु या स्थायी वियोग का वर्णन होता है, वहां करुण रस होता है l करुण रस का स्थायी भाव शोक होता है l

उदाहरण – सब बधुन को सोच तजि, तजि गुरुकुल नेह l
        हा सुशील सूत ! किमी कियो अनंत लोक में नेह ll

स्थायी भाव – शोक l
संचारी भाव – दीनता,मोह, विषद, जड़ता l
अनुभाव – दुःख के उद्गार 
विभाव – आलम्बन (क) आश्रय – पिता (ख) विषय – पिता 

4. रौंद्र रस :- सहृदय के हृदय में स्थित क्रोध नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग होता है, तब रौंद्र रस का  जन्म होता है l रौंद्र का स्थायी भाव क्रोध होता है l

उदाहरण – श्रीक्रष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे l
    सब शोक अपना भूलकर, करतल युगल मलने लगे ll

संसार शोक अपना भूलकर, करतल युगल मलने लगे l 
करते हुए यह घोषणा, वे हो गये उठकर खड़े ll

स्थायी भाव – क्रोध
संचारी भाव – स्मृति, उग्रता, गर्व, आवेश
अनुभाव – क्रोध से जलना, हाथ मलना,खड़े हो ललकार 
विभाव – आलम्बन – आश्रय – अर्जुन 
विषय – शत्रु
उद्दीपन – श्रीकृष्ण के वचन, युद्ध के बजे 
   
5. वीर रस :- उत्साह नामक स्थायी भाव का जब विभव,अनुभाव,एवं संचारी भाव से संयोग होता है, उसे वीर रस कहते है l 

उदाहरण-   हे सारथे! है द्रोण क्या देवेन्द्र भी आकर अड़े l
 है खेल क्षत्रिय बालको का व्यूह – भेदन कर लड़े ll

मै सत्य कहता हूँ सखे ! सुकुमार मत जानो मुझे l
यमराज से भी युद्ध को प्रस्तुत सदा मानो मुझे ll

स्थायी भाव – उत्साह 
संचारी भाव – उत्सुकता, रोमांच, आनंद, हर्ष, गर्व 
अनुभाव – अभिमन्यु के वचन,युद्ध की तैयारी, युद्ध के लिए प्रस्थान,
विभाव – अभिमन्यु, शत्रु पक्ष 

6. भयानक रस :- सहृदय के हृदय में स्थित भय नामक स्थायी भाव का जब विभव, अनुभाव तथा संचारी भाव के साथ संयोग होता है, तब भयानक रस की उत्पत्ति होती है l

उदाहरण- नभ ते झटपट बाज लखि, भूल्यो सकल प्रपंच l
कंपित तन व्याकुल नयन, लावक हिल्यो रंच ll

एक ओर अजगरहिं लखि, एक ओर मृगराय l
विकल बरोही बीच ही, परयो मूर्छा खाय ll

स्थायी भाव- भय, डर
संचारी भाव – स्तम्भ, कम्प, आँसू, स्वेद मूर्छा
विभाव- आलम्बन, आश्रय – बरोही, विषय – अजगर, शेर

7. वीभत्स रस :- जब रक्त, मानस, मज्जा आदि घृणित वस्तुएँ तथा नैतिक पतन आदि देखने में आए तब वहां जो ग्लानि पैदा होती है, वीभत्स रस होता है l
या
सहृदय के हृदय में स्थित जुगुत्सा, घृणा नामक स्थायी भाव का जब अनुभाव, विभव, तथा संचारी भाव से संयोग होता है, वहां वीभत्स रस होता है l

उदाहरण - गीद्ध जौंध की खोद- खोद कै मांस उचारत l
स्वान अंगुरिन काट-काट के खात  निकारत ll

स्थयी भाव – जुगुत्सा (घृणा)
संचारी भाव – ग्लानि, विषाद, उन्माद, आवेग
अनुभाव – स्तंभ, कम्प, आँसू, थू-थू करना, नाक बंद करना 
विभव – आश्रय – पाठक, श्रोता, विषय – लाश l 

8. अदभुत रस :- सहृदय के हृदय में स्थित विस्मय नामक स्थायी भाव का जब विभव, अनुभाव, एवं संचारी भाव के साथ संयोग होता है, तब अदभुत रस का जन्म होता है l
या आश्चर्यजनक वस्तु को देखकर व्यक्ति का विस्मय जाग्रत हो जाता है, वह अदभुत रस होता है l 

उदाहरण – अखिल भुवन चर अचर सब, हरिमुख में लखि मातु l 
               चकित भई गदगद वचन, विकसित दृग पुलकातु l l 

भगवान श्री कृष्ण के मुख में सारे भुवनो, चर-अचरको देखकर माता यसोदा आश्चर्य चकित हो उठी l 
स्थायी भाव – विस्मय 
संचारी भाव – त्रास, दैन्य 
अनुभाव – विस्भारित नेत्र, गदगद स्वर, रोमांच 
विभाव – (१) आलम्बन- कृष्ण का मुख (२) उद्दीपन- मुख में सारे भुवनो का दिखना l      

9. शांत रस :- सहृदय के हृदय में स्थित निर्वेद नामक स्थायी भाव का जब विभव, अनुभाव और संचारी भाव के साथ संयोग हो जाता है तो वहां शांत रस होता है l
या 
जहाँ सांसारिक वस्तुओं में विरक्ति का वर्णन हो, वहां शांत रस होता है l
उदाहरण- अबलौ नसानी अब न नसैहों l
राम कृपा अब निसा सिरानी,जगे पुनि न उसैहों l
पायो राम नाम चिंतामणि उर कर ते न खसैहों ll 

स्थायी भाव – शान्ति, निर्वेद 
संचारी भाव – स्मृति, चिंता, हर्ष, स्मरण 
अनुभाव – कम्प स्वरभंग, आँसू, रोमांच 
विभाव – आलम्बन – आश्रय – कवि, श्रोता, पाठक 
विषय – ईश्वर, राम 

10. वात्सल्य रस :- सहृदय के हृदय में स्थित वत्सल (पुत्र-प्रेम) नामक स्थायी भाव का जब विभव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग होता है, वहां वात्सल्य रस की उत्पत्ति होती है l 
या
बालकों की चेष्टाओं,हरकतों से माता के हृदय में स्थित जिस भाव की उत्पति होती है, उसे वात्सल्य रस कहते हैं l

उदाहरण - कौशल्या जब बोलन जाई, ठुमकु-ठुमकु प्रभु चलहिं पराई l
भोजन करन बुलावत रजा, नहिं आवत तजि बाल समजा ll

स्थायी भाव – पुत्र प्रेम 
संचारी भाव – हर्ष, आनंद, उन्माद, स्मृति, गर्व
अनुभाव – रोमांच, हँसना, गोद में बैठाना
विभाव – आलम्बन – आश्रय – रजा दशरथ एवं माता कौशल्या, विषय – राम, उद्दीपन – राम का सौन्दर्य  

कुछ महत्वपूर्ण जानकारी :-

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